पहले के इंसानों, जीवों में शांति सुकून था तो वही आज का इंसान जीव इधर-उधरभटक क्यों रहा है ?

मनुष्य का जीवन शत रज तम और तीन प्रकार के मुख्य गुणों के साथ उत्पन्न हुआ है जिसमें सत यानि (सत्व ) ज्ञान होता है , तो वही रज का अर्थ क्रिया या फिर इच्छा करना होता है , वहीँ तम शब्द का अर्थ अंधकार(अलाश्य ) होता है,इन तीनों शब्दों के यदिमानव जीवन कीशुरुआत से लेकर अंत तकके जीवन में इसकी यथार्थता को देखें तो यह पूर्णतया सत्य और परिलक्षित होता है कि मनुष्यजीवन में बिना क्रिया या कर्म किए रह नहीं सकता तो वही जीवन में कई मौकों पर
अंधकार यानी कि आलस से या फिर ह|नी या नुकसान व्यक्ति को सहना पड़ता है तो वही जीवन मेंयथार्थ सत्य को कोई भी व्यक्ति टाल नहीं सकता क्योंकियह सत्यसभी वस्तुओंपर लागू होती है चाहे व्यक्ति माने या ना माने लेकिन जो यथार्थ सत्य है वह सत्य ही रहता है। वर्तमान समय मेंइंसानचक चांद की दुनिया में इधर-उधरएक दूसरे से आगे बढ़ निकालने या फिर दूसरेव्यक्ति से अपने आप को श्रेष्ठ दिखानेके लिएदिन-रातकोशिश करता रहता है लेकिनवह कभी दूसरे
व्यक्ति जैसा हो बहूया 100% ना बन पाता है और ना ही यह जीवन में संभव है तो आखिर भाग दौड़ किस बात की और किस लिए इतना सब दिखावा।इन सब से आगेएक सुकून और शांति का रास्ता है जहां पर इन सबचीजों और ऊपर बताए गए जीवन की मूल बिंदुओं को एक समान रूप मेंआपस में सामंजस स्थापित करकेसुकून भरा जीवन जिया जा सकता है जिसके लिए सभी मुख्य बिंदुओंऔर जीवन के यथार्थ से जुड़ी हुईसत्यऔर यथार्थ चीजों को मानकर इंसान जीवन भर सुखी और आनंद का जीवन जी सकता है।
मनुष्य का जीवन ही नहीं सभी प्राणी जीव में अपनी एक अभिलाष यह आकांक्षा या चाह होती है जिसके लिए मनुष्य जीवन भर अथक प्रयास करता है और उसके बदले में उसे कुछ ना कुछ क्रिया के बदले प्राप्त होता हैलेकिनकिसी चीज को चाह कर किया गया प्रयास की बावजूद भीउसे प्रतिफल के बदले जब इंसान या जीव कोसुकून शांति नहीं मिलती तब वह किया गया प्रयासऔर कार्य हमेशानिष्फल रहता है ।यह इसी वजह से होता है किकिसी एक इच्छा की पूर्ति के बाद
हमेशा निरंतर चाहा और अभिलाषा की साथ-साथ मां की तृष्णा और लगातार पानी की इच्छा की वजह से यह जीवनहमेशाइस नाव की भांति हो जाता है जो कि गहरे समुद्र की बीचो-बीच भारीशांत जल प्रवाह में तीव्र गति से आगे बढ़ाने के लिए लगातारप्रयास करती है लेकिनहवा रुकी रूपी झोंकों की वजह से वह नौका हमेशा डगमगाती हुईअंततः सागर में डूब जाती है और उसे ना तोअपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है ना हीकिनारे पर जाने का मौका मिलता है लेकिन वही जो न|व शांत अवस्था में हवा औरसमुद्र की लहरों से सामंजस से बनाकर आगे बढ़ती ही वह हमेशा किनारे पर पहुंच जाती है
और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेती है इसी तरह मनुष्य का जीवन हैयदि मनुष्य चाहे तोइन कभी न मिटने वाली तृष्णा छहको संतुष्टि में बदलकर अपने जीवन के लक्ष्य और जीवन में सुख शांति के साथ-साथ परम आनंद को प्राप्त कर सकता है।